Sunday, 17 December 2017

स्वामी दयानंद सरस्वती | Swami Dayanand Saraswati in Hindi

स्वामी दयानंद सरस्वती | Swami Dayanand Saraswati in Hindi-

उन्नीसवीं शताब्दी के महान समाज-सुधारकों में स्वामी दयानंद सरस्वती – Swami Dayanand Saraswati का नाम अत्यंत श्रध्दा के साथ लिया जाता है. जिस समय भारत में चारों ओर पाखंड और मुर्ति-पूजा का बोल-बाला था, स्वामी जी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई.
उन्होंने भारत में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए 1876 में हरिव्दार के कुंभ मेले के अवसर पर पाखण्डखंडिनी पताका फहराकर पोंगा-पंथियों को चुनौती दी. उन्होंने फिर से वेद की महिमा की स्थापना की. उन्होंने एक ऐसे समाज की स्थापना की जिसके विचार सुधारवादी और प्रगतिशील थे, जिसे उन्होंने आर्यसमाज के नाम से पुकारा.

स्वामी दयानंद सरस्वती – Swami Dayanand Saraswati in Hindi

पूरा नाम  – मूलशंकर अंबाशंकर तिवारी
जन्म       – 12 फरवरी 1824
जन्मस्थान – टंकारा (मोखी संस्थान, गुजरात)
पिता       – अंबाशंकर
माता       – अमृतबाई
शिक्षा      – शालेय शिक्षा नहीं ले पाये.
विवाह     – शादी नहीं की.
जीवन पलट देनेवाली घटना – एक बार शिवरात्री थी. पिताजी ने कहा, “मुलशंकर, आज सभी ने उपवास करके रातभर मंदीर में जगना और शिवजी की पूजा करना.” ये सुनकर मुलशंकर ने उपवास किया. दीन खतम हुवा, रात हुयी. मुलशंकर और पिताजी शिवजी के मंदीर गये. उन्होंने पूजा की रात के बारा बज गये. पिताजी को नींद आने लगी. पर मुलशंकर जागता रहा. मेरा उपवास निरर्थक जायेगा इस वजहसे सोया नही.
मंदिर में के चूहे बिल में से बाहर आये. और शिव जी के पास घूमने लगे. वहा के प्रसाद खाने लगे. ये नजारा देखकर जो मूरत चूहों से अपनी रक्षा नहीं कर सकती. वो भक्तो को संकट में कैसी रक्षा करेगी. मूरत में कोई सामर्थ्य नही होता, तो मुर्ति पूजा को भी कोई अर्थ नहीं, ऐसे अनेक विचार उनके मन आने लगे उस समय से उनके मन में धर्म के विषय में जिज्ञासा जागृत हुयी. भगवान का शाक्ष्वत स्वरूप और धर्म का सच्चा अर्थ जानने की इच्छा और बढी.
जीवन क्या है? मृत्यु क्या है? इन सवालों के जवाब सक्षम महात्मा से समझ लेना चाहिये, ऐसा उन्हें लगा. इस ध्येय प्राप्ती के लिये उन्होंने 21 साल की उम्र में अपना घर छोड़ा. उनके परिवार के बड़े सदस्योने उनकी विवाह के बारे में चलाये विचार ये उनके इस निर्णय के दलील हुयी.
भौतिक सुख का आनंद लेने के अलावा खुद की आध्यात्मिक उन्नत्ती करवा लेना उन्हें अधिक महत्त्वपूर्ण लगा.
उन्होंने मथुरा में स्वामी विरजानंद जि के पास रहकर वेद आदि आर्य-ग्रंथों का अध्ययन किया. गुरुदक्षिणा के रूप में स्वामी विरजानंद जी ने उनसे यह प्रण लिया कि वे आयु-भर वेद आदि सत्य विद्याओं का प्रचार करते रहेंगे. स्वामी दयानंद जी ने अंत तक इस प्रण को निभाया.
स्वामी दयानंद जी का कहना था कि विदेशी शासन किसी भी रूप में स्वीकार करने योग्य नहीं होता. स्वामी जी महान राष्ट्र-भक्त और समाज-सुधारक थे. समाज-सुधार के संबंध में गांधी जी ने भी उनके अनेक कार्यक्रमों को स्वीकार किया.
कहा जाता है कि 1857 में स्वतंत्रता-संग्राम में भी स्वामी जी ने राष्ट्र के लिए जो कार्य किया वह राष्ट्र के कर्णधारों के लिए सदैव मार्गदर्शन का काम करता रहेगा. स्वामी जी ने विष देने वाले व्यक्ति को भी क्षमा कर दिया, यह बात उनकी दयाभावना का जीता-जागता प्रमाण है.

Swami Dayanand Saraswati Biography in Hindi

दयानंद सरस्वती का जन्म एक हिंदु धर्म के नेता के रूप में हुआ, वे आर्य समाज के संस्थापक थे. हिन्दुओ में वैदिक परंपरा को मुख्य स्थान दिलवाने के अभियान में उनका मुख्य हात था. वे वैदिक विद्या और संस्कृत भाषा के विद्वान थे.
वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज्य की लड़ाई शुरू की जिसे 1876 में “भारतीयों का भारत” नाम दिया गया, जो बाद में लोकमान्य तिलक ने अपनाया. उस समय हिन्दुओ में मूर्ति पूजा काफी प्रचलित थी, इसलिए वे उस समय वैदिक परंपरा को पुनर्स्थापित करना चाहते थे.
परिणामस्वरूप महान विचारवंत और भारत के राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन ने उन्हें “आधुनिक भारत के निर्माता” कहा, जैसा की उन्होंने श्री औरोबिन्दो को कहा था.
जिनपर दयानंद का बहोत प्रभाव पड़ा, और उनके अनुयायियों की सूचि में मॅडम कामा, पंडित लेख राम, स्वामी श्रद्धानंद, पंडित गुरु दत्त विद्यार्थी, श्याम कृष्णन वर्मा (जिन्होंने इंग्लैंड में भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का घर निर्मित किया था), विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, मदन लाल धींगरा, राम प्रसाद बिस्मिल, महादेव गोविन्द, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय और कई लोग शामिल थे.
दयानंद सरस्वती द्वारा किया गया सबसे प्रभावी कार्य मतलब ही उनकी किताब “सत्यार्थ प्रकाश” थी. जिसमे भारतीय स्वतंत्रता की नीव रखी गयी. वे लकड़पन (Boyhood) से ही सन्यासी और विद्वान थे, जो वेदों की अपतनशील शक्तियों पर भरोसा रखते थे.
महर्षि दयानंद कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत के अधिवक्ता थे. वे वैदिक क्रिया जैसे ब्रह्मचर्यं और भगवान की भक्ति पर ज्यादा ध्यान देते थे. अध्यात्म विद्या विषयक समाज और आर्य समाज को 1878 से 1882 तक एकजुट किया गया. जो बाद में आर्य समाज का ही भाग बना.
महर्षि देवानंद के महान कार्यो में महिलायों के हक्को के लिए लड़ना भी शामिल है. महिलाओ के हक्क जैसे- पढाई करने का अधिकार, वैदिक संस्कृति पढने का अधिकार इन सब पर उन्होंने उस समय ज्यादा जोर दिया, ताकि सभी लोग हिंदु संस्कृति को अच्छी तरह से जान सके. दयानंद वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दलितों को स्वदेशी और हरिजन अजिसे नाम दिए और महात्मा गांधी से पहले अछूत परंपरा को दूर किया था.
भारतीय स्वतंत्रता के अभियान में महर्षि दयानंद सरस्वती का बहोत बड़ा हात था. उन्होंने अपने जीवन में कई तरह के समाज सुधारक काम किये. और साथ लो लोगो को स्वतंत्रता पाने के लिए प्रेरित भी किया.
आर्य समाज को स्थापित कर के उन्होंने भारत में डूब चुकी वैदिक परम्पराओ को पुनर्स्थापित किया और विश्व को हिंदु धर्म की पहचान करवाई. उनके बाद कई स्वतंत्रता सेनानियों ने उनके काम को आगे बढाया. और आज ऐसे ही महापुरुषों की वजह से हम स्वतंत्र भारत में रह रहे है.
ग्रंथ संपत्ती – Swami Dayanand Saraswati Book’s
  • सत्यार्थ – प्रकाश
  • ॠग्वेद भूमिका
  • वेदभाष्य
  • संस्कार निधी
  • व्यवहार भानू आदी ग्रंथ उन्होंने लिखे.
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दादाभाई नौरोजी जीवन परिचय | Dadabhai Naoroji biography in Hindi

दादाभाई नौरोजी जीवन परिचय | Dadabhai Naoroji biography in Hindi-

Dadabhai Naoroji – दादाभाई नौरोजी भारतीय इतिहास के एक महान व्यक्ति के नाम से जाने जाते है। वे एक पारसी बुद्धिजीवी व्यक्ति, शिक्षप्रेमि, कॉटन के व्यापारी और साथ ही भारतीय स्वतंत्रता अभियान के महान राजनितिक नेता भी थे।

दादाभाई नौरोजी जीवन परिचय – Dadabhai Naoroji biography in Hindi

पूरा नाम    – दादाभाई पालनजी नौरोजी
जन्म        – 4 सितंबर 1825
जन्मस्थान – बम्बई
पिता        – पालनजी दोर्डी नौरोजी
माता        – माणिकबाई
शिक्षा       – 1845 में बंम्बई के एलफिन्स्टन विश्वविद्यालय से उपाधि संपादन की।
विवाह      – गुलाबी के साथ।
नौरोजी का जन्म मुम्बई में हुआ और उन्होंने Elphinstone College से शिक्षा ग्रहण की। उनकी कुशलता को निहारते हुए बरोदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय ने उन्हें 1874 में अपने साम्राज्य का दीवान बनाया। नौरोजी महाराजा द्वारा दिए गए हर एक आदेश का पालन करते और इसी के चलते उन्होंने रहनुमाई मैदायस्ने सभा (जो मैदायस्ने मार्ग के पथप्रदर्शक थे) को 1 अगस्त 1851 को खोज निकाला और जरदुष्ट धर्म को पुर्नस्थापित करने में जूट गए। 1854 में उन्होंने इस समुदाय को आसानी से समझने के लिए एक प्रकाशन की खोज की, जिस से वे आसानी से लोगो के बिच रह सके। 1855 में उन्हें elphinstone College में गणित के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया, उस समय ऐसा शैक्षणिक दर्जा पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। 1855 में उन्होंने कामा & कंपनी के सहयोगी बनने की इच्छा से लंदन की यात्रा की और साथ ही यह पहली भारतीय कंपनी बनी जो ब्रिटेन में स्थापित हुई। लेकिन 3 साल के अंदर ही नौरोजी ने इस्तीफा दे दिया। 1859 में उन्होंने खुद की एक कॉटन ट्रेडिंग कंपनी स्थापित की, जो बाद में दादाभाई नौरोजी & कंपनी के नाम से जाने जानी लगी, वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन के गुजरात में पहले प्रोफेसर बने।
1867 में दादाभाई नौरोजी ने ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना में सहायता भी की जो भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस की एक मुख्य संस्था थी जिसका मुख्य उद्देश् ब्रिटिशो के सामने भारतीयो की ताकत को रखना था। बाद में लंदन की एथेनॉलॉजिकल सोसाइटी ने इसे प्रचारविधान संस्था बतलाकर 1866 में भारतीयो की हीनभावना को दर्शाने की कोशिश की। इस संस्था को बाद में प्रसिद्द यूरोपियन लोगो का सहयोग मिला और बाद में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन में ब्रिटिश संसद पर अपना प्रभाव छोड़ना शुरू किया। 1874 में वे बारोदा के प्रधानमंत्री बने और 1885 से 1888 तक मुंबई लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य बने। वे सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा कलकत्ता में बॉम्बे के भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व भारतीय राष्ट्रिय एसोसिएशन के सदस्य भी बने। भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रिय एसोसिएशन का एक ही उद्देश था। बाद में इन दोनों को मिलकर INC की स्थापना की गयी, 1886 में नौरोजी की भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया। नौरोजी ने 1901 में अपनी किताब “Poverty And Un-British Rule in India” को प्रकाशित किया।
1892 से 1895 तक यूनाइटेड किंगडम भवन की संसद में उदारपंथी पार्टी के नेता थे और ब्रिटिशो के M.P. बनने वाले वे पहले एशियाई थे। उन्होंने ऐ.ओ. हुमे और एडुलजी वाचा के साथ मिलकर उस समय की विशाल पार्टी भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस को और अधिक शक्तिशाली बनाया। उनकी किताब गरीबी और भारत में ब्रिटिश नियमो विनाश करना, को उस समय भारतीय समाज का बहोत प्रतिसाद मिला। उन्होंने उस समय अपनी किताब में विदेशो में ले जाये भारतीय धन को वापिस लाने की भी मांग की। वे कौस्तस्कि और प्लेखानोव के साथ दूसरे अंतर्राष्ट्रीय समूह के सदस्य भी रह चुके थे।
दादाभाई नौरोजी ने विदेशो में भारत का वर्चस्व बढाया और यूरोपियन लोगो को भारतीयों की ताकत और बुद्धिमत्ता का दर्शन करवाया। ब्रिटिश कालीन भारत में ब्रिटिश अधिकारी भारतीयों से नफरत करते थे उस समय उन्होंने अपनी खुद की कॉटन कंपनी स्थापित कर के ब्रिटिश कंपनियों को कड़ी टक्कर दी थी। वे एक व्यापारी होने के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के महान क्रन्तिकारी नेता भी थे।

Dadabhai Naoroji Contribution  –

  1. शिक्षा पूरी करने  बाद उनकी बम्बई के एलफिन्स्टन कॉलेज में गणित के अध्यापक के रूप में नियुक्ती हुयी। इस कॉलेज में अध्यापक होने का सम्मान पाने वाले वो पहले भारतीय थे।
  2. 1851 में लोगोंमे सामाजिक और राजकीय सवालो पर जागृती लाने के लिये दादाभाई नौरोजीने ‘रास्त गोफ्तार’ (सच्चा समाचार ) ये गुजराती साप्ताहिक शुरु किया।
  3. 1852में दादाभाई नौरोजी और नाना शंकर सेठ इन दोनोंने आगे बठकर बंम्बई में ‘बॉम्बे असोसिएशन’ इस संस्था की स्थापना की। हिंदू जनता की दुख, कठिनाइयाँ अंग्रेज सरकार को दीखाना और जनता के सुख के लिये सरकार ने हर एक बात के लिये मन से मदत करनी चाहिये, ये इस संस्था स्थापना का उददेश्य था।
  4. 1855 में लंडन के ‘कामा और कंपनी’ के मॅनेजर के रूप में वहा गये।
  5. 1865 से 1866 इस समय में उन्होंने लंडन के युनिव्हर्सिटी कॉलेज मे गुजराती भाषा के अध्यापक के रूप में भी काम किया।
  6. 1866 में दादाभाई नौरोजी ने इंग्लंड में रहते समय मे ‘ईस्ट इंडिया असोसिएशन’ इस नाम की संस्था स्थापन की। हिंदु लोगोंके आर्थिक समस्या के बारेमे सोच कर और उन सवालोपर इंग्लंड में के लोगोंका वोट खुद को अनुकूल बना लेना ये इस संस्था का उददेश्य था।
  7. 1874 में बडोदा संस्थान के मुनशी पद की जिम्मेदारी उन्होंने स्वीकार की। बहोत सुधार करने के वजह से उनकी कामगिरी संस्मरणीय रही। पर दरबार के लोगों के कार्यवाही के वजह से दादाभाई नौरोजी कम समय में मुनशी पद छोड़कर चले गये।
  8. 1875 मे वो बम्बई महानगरपालिका के सदंस्य बने।
  9. 1885 मे बम्बई प्रातिंय  कांयदेमंडल के सदस्य हुये।
  10. 1885 मे बम्बई मे राष्ट्रीय सभा की स्थापना की गयी उसमे दादाभाई नौरोजी आगे थे।
  11. 1886 (कोलकता), 1893 (लाहोर) और 1906 (कोलकता) ऐसे तीन अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में उन्हें चुना गया।
  12. 1892 मे इंग्लंड मे के ‘फिन्सबरी’ मतदार संघ में से वो हाउस ऑफ कॉमन्सवर चुनकर आये थे। ब्रिटिश संसद के पहले हिंदू सदस्य बनने का सम्मान उनको मिला।
  13. 1906 मे कोलकाता यहा अधिवेशन था। तब दादाभाई नौरोजी उसके अध्यक्ष थे उस अधिवेशन मे स्वराज्य की मांग की गयी। उस मांग को दादाभाई नौरोजीने समर्थन दिया।
  14. ब्रिटिश राज्यकर्ता ने भारत की बहोत आर्थिक लुट कर रहे थे। ये दादाभाई ने ‘लुट का सिध्दांत’ या ‘नि:सारण सिध्दांत’ से स्पष्ट किया।
ग्रंथ संपत्ती – पावर्टी और  अन ब्रिटिश रुल इन इंडिया।
विशेषता    –
  • भारत के पितामह।
  • भारतीय अर्थशास्त्र के जनक।
  • आर्थिक राष्ट्रवाद के जनक।
  • रॉयल कमीशन के पहले भारतीय सदस्य।
मृत्यु  – 30 जून, 1917 को दादाभाई नौरोजीका देहांत हुवा।
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गोपाल कृष्ण गोखले जीवनी | Gopal Krishna Gokhale

गोपाल कृष्ण गोखले जीवनी | Gopal Krishna Gokhale-


Gopal Krishna Gokhale – गोपाल क्रिष्ण गोखले भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के मुख्य नेताओ में से एक थे. वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के राजनैतिक गुरु भी थे. 1905 में बनारस में हुए कांग्रेस के विशेष सत्र को इन्होंने संबोधित भी किया था. उन्होंने कांग्रेस पार्टी में उग्रवादियों के प्रवेश का विरोध भी किया था. उन्होंने अपने जीवनकाल में कई महत्वपूर्ण काम किये हैं. इस लेख में उनके बारे में जानते हैं.

गोपाल कृष्ण गोखले – Gopal Krishna Gokhale

पूरा नाम  – गोपाल कृष्ण गोखले.
जन्म –   9 मई 1966.
जन्मस्थान – कोतलूक (जि. रत्नागिरी, महाराष्ट्र).
पिता   – कृष्णराव गोखले.
माता  –  सत्यभामा गोखले.
शिक्षा –  1884 मे बम्बई एलफिन्स्टन कॉलेज से B.A. (गणित) की परिक्षा उत्तीर्ण.
विवाह –  सावित्रीबाई के साथ.
गोपाल कृष्णा गोखले ब्रिटिश राज के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक सामाजिक और राजनैतिक नेता थे. गोखले भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के वरिष्ट नेता और भारतीय कर्मचारी संस्था के संस्थापक थे. कांग्रेस और अपनी कर्मचारी संस्था के साथ-साथ अन्य क्रन्तिकारी संस्थाओ के लिए भी गोखले ने काम किया. गोखले केवल ब्रिटिश राज को खत्म करने के लिए ही नहीं लढे बल्कि देश का विकास करने के लिए सतत कोशिशे करते रहते थे. उनके इस लक्ष को प्राप्त करने के लिए वे महात्मा के तत्व- अहिंसा का पालन करते और सरकारी संस्थाओ में सुधार करने की कोशिश करते.

गोपाल कृष्णा गोखले शिक्षा / Gopal Krishna Gokhale Education

गोपाल कृष्णा गोखले / Gopal Krishna Gokhale का जन्म चित्पावन ब्राह्मण परिवार में 9 मई 1866 को रत्नागिरी जिले के गुहागर तालुका के कोठ्लुक ग्राम में हुआ, जो अभी महाराष्ट्र (उस समय बॉम्बे राज्य का भाग) में स्थित है. एक गरीब परिवार से होने के बावजूद उनके परिवार वालो ने उन्हें इंग्लिश शिक्षा प्रदान की. और इसी वजहसे उन्हें ब्रिटिश राज में किसी छोटे कार्यालय में एक कर्मचारी की नौकरी मिली. वे भारतीयों में विश्व्विद्यालायीं शिक्षा प्राप्त करने वाली पहली पीढ़ी में से एक थे. गोखले 1884 में Elphinstone College से ग्रेजुएट हुए.
गोखले पर शिक्षा ग्रहण करने के दौरान पश्चिमी विद्वानों के विचारो का बहोत प्रभाव पड़ा. वे पश्चिमी राजनीती से दूर रहते थे लेकिन पश्चिमी सिद्धान्तकर जॉन स्टुअर्ट मिल और अदमुन्द बुर्के के सिद्धांतो का उनपर बहोत प्रभाव पड़ा. पढ़ते समय उन्होंने कई इंग्लिश सिद्धांतो की आलोचना भी की.

गोपाल कृष्णा गोखले परिवार / Gopala Krishna Gokhale Family – Personal Life

गोखले अपने अंतिम वर्षो में भी राजनैतिक जीवन में सक्रीय थे. वे अपने जीवन में अंतिम वर्षो में भी विदेशी यात्रा करते, 1908 में उन्होंने इंग्लैंड की ट्रिप की, साथ ही 1912 में वे साऊथ अफ्रीका भी गये, जहा उन्होंने देखा की महात्मा गांधीजी – Mahatma Gandhi वहा रहने वाले भारतीयों की परिस्थितियों में सुधार कर रहे है, तो गोखले ने भी उनका साथ दिया. साथ ही वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस, भारतीय कर्मचारी संस्था और कानूनी संस्थाओ के साथ मिलकर ब्रिटिश राज को खत्म करने का प्रयास कर रहे थे.
वे भारत में शिक्षा प्रणाली को विकसित करना चाहते थे, ताकि युवाओ को अच्छे से अच्छी शिक्षा प्राप्त हो सके. इन सभी विचारो ने उन्हें बहोत क्षति पहोचाई, और अंत में 19 फेब्रुअरी 1915 को 49 साल की आयु में उनकी मृत्यु हो गयी. बाल गंगाधर तिलक – Bal Gangadhar Tilak जो हमेशा से उनके राजनैतिक विरोधी थे, उन्होंने उनके दाह-संस्कार में कहा की, “भारत का यह हीरा, महाराष्ट्र का अनमोल रत्न, कर्मचारियों का बादशाह शाश्वत रूप से इस जमीन पर विश्राम कर रहा है. उनकी तरफ देखो और उनका अनुकरण करो”. गोखले हम सभी के लिए अनश्वर और अमर व्यक्ति थे.
गोपाल कृष्णा गोखले / Gopal Krishna Gokhale एक ऐसा नाम था जिसे अंग्रेज भी बड़ी इज्ज़त से लेते थे. एक ऐसे स्वाध्यायी व विद्वान जिनके बारे में स्वयं उस समय के भारतीय कमांडर-इन चीफ किचनर ने कहा था- “गोखले ने यदि कोई अंग्रेजी पुस्तक नहीं पढ़ी है अवश्य ही वह पढने योग्य होगी ही नहीं”.
गोपालकृष्ण गोखले एक ऐसी विभूति जिसने भारतीय जन-जीवन में स्वाधीनता का मन्त्र ऐसा फुका की अंग्रेज हिल गये. एक ऐसे राजनीतिज्ञ जिन्हें महात्मा गांधीजी – Mahatma Gandhi जी भी अपना राजनितिक गुरु मानते थे और उन्हें सलाह लेते थे.
एक नजर में गोपाल कृष्ण गोखले का इतिहास / GK Gokhale History
1) 1885 मे पुणा के न्यु इंग्लिश में 35 रु. तनखा पर उन्होंने शिक्षक की नौकरी स्वीकार की.
2) 1886 में पूणा के डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी के आजीव सदस्य बने.
3) 1887 से फर्ग्युसन कॉलेज मे अंग्रेजी और इतिहास विषय के अध्यापक के रूप मे काम किया.अंग्रेजी भाषा पर उनका बहुत अच्छा प्रभुत्व था.
4) 1888 मे ‘सुधारक’ इस अखबार के अंग्रेजी विभाग के संपादक की जिम्मेदारी गोपाल कृष्ण गोखले इन्होंने संभाली.
5) 1889 मे Gopal Krishna Gokhale राष्ट्रीय कॉग्रेस मे प्रवेश.
6) 1890 सार्वजानिक सभा के सचिव के रूप में उनको चुना गया.
7) 1895 में बम्बई विश्वविद्यालय के सिनेट पर ‘फेलो’ के रूप मे उनकी नियुक्त हुयी.
8) 1897 मे गोखले इन्होंने वेल्बी कमिशन के आगे गवाही देने के लिये इंग्लंड गये. उसके बाद अनेक कारणों की वजह सें और छे बार वो इंग्लंड गये.
9) 1899 में बम्बई प्रांतिंक कानून बोर्ड के सभासद के रूप मे चूना गया.
10) 1902 मे केंद्रीय कानून बोर्ड के सभासद के रूप मे नियुक्ती हुयी.
11) 1905 मे ‘भारत सेवक समाज’ (सर्व्हन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी) ये संस्था स्थापना की. राष्ट्र के सेवा के लिये प्रमाणिक श्रध्दालु और त्याग भावना से कार्य करनेवाले सामाजिक और राजकीय कार्यकर्ते तयार करना ये इस संस्था के स्थापना के पिछे मुख्य उददेश था.
12) 1905 मे बनारस मे हुये राष्ट्रीय कॉग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप मे उनको नियुक्त किया गया.
13) 1912 मे उनकी भारत मे सिवील सवर्न्ट से संबधित रॉयल कमिशन के सदस्य के रूप में उनको चुना गया.
14) 1912 मे महात्मा गांधी के बुलाने से वो दक्षिण आफ्रिका गये. दक्षिण आफ्रिका मे के सत्याग्रही आंदोलन को सहाय्य करने के लिये निधी जमा करने के काम मे भी वो आगे थे.
विशेषता  – महात्मा गांधी ने गोपाल कृष्ण गोखले इनको आजन्म गुरु माना.
मृत्यु     – 19 फरवरी 1915 को गोपाल कृष्ण गोखले / Gopal Krishna Gokhale मृत्यु हुयी.
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Indira Gandhi Biography in Hindi – इंदिरा गांधी की जीवनी

Indira Gandhi Biography in Hindi – इंदिरा गांधी की जीवनी-

Indira Gandhi – इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी – भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस का केंद्र बिंदु भी थी। इंदिरा गांधी जिन्होंने 1966 से 1977 और बाद में फिर से 1980 से 1984 में उनकी हत्या तक उन्होंने देश की सेवा की। Indira Gandhi भारत की सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहने के मामले में दुसरे स्थान पर थी और प्रधानमंत्री कार्यालय सँभालने वाली वो अब तक की अकेली महिला रही है।

Indira Gandhi Biography in Hindi – इंदिरा गांधी की जीवनी

पूरा नाम  – इंदिरा फिरोज गांधी
जन्म       – 19 नव्हंबर 1917
जन्मस्थान – इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)
पिता       – पंडित जवाहरलाल नेहरु
माता       – कमला जवाहरलाल नेहरु
शिक्षा      – इलाहाबाद, पुणा, बम्बई, कोलकता इसी जगह उनकी शिक्षा हुई। उच्च शिक्षा के लिए इग्लंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया कुछ करानवंश उन्हें उपाधि लिए बगैर शिक्षा छोड़कर अपने देश वापस आना पड़ा।
विवाह     – फिरोज गांधी के साथ १९४२
इंदिरा गांधी, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की बेटी थी। इंदिरा ने अपने पापा के राष्ट्रस्तरीय संस्था की 1947-1964 तक मुख्यमंत्री के रूप में सेवा की। उनके इस योगदान को देखते हुए उन्हें 1959 में राष्ट्रिय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया।
1964 में उनकी पिता की मृत्यु के बाद, इंदिरा जी ने कांग्रेस पार्टी के नेता बनने के संघर्ष को छोड़ दिया और और लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने की ठानी। शास्त्री की मृत्यु के बाद विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की अध्यक्षा इंदिरा गांधी मोरारजी देसाई को हराया और भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी।
प्रधानमंत्री होने के साथ ही इंदिरा जी अपनी राजनितिक क्रूरता और बेमिसाल केन्द्रीकरण के लिए जानी जाती। वह स्वतंत्रता के लिए पकिस्तान का साथ देने भी तैयार रही उन्होंने पाकिस्तान के स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका साथ दिया जिससे पकिस्तान ने विजय हासिल की और बांग्लादेश की निर्मिती हुई।
इंदिरा गांधी ने 1975 से 1977 तक राज्यों में आपातकाल की स्थिति घोषित की और सभी राज्यों में इसे लागू करने का भी आदेश किया। 1984 में जब वह पंजाब के हरमंदिर साहिब, अमृतसर को आदेश दे रही थी तभी उनके सीख अंगरक्षक द्वारा उनकी हत्या की गयी।

इंदिरा गांधी प्रारंभिक जीवन – Indira Gandhi History in Hindi

इंदिरा गांधी का जन्म इंदिरा नेहरु के नाम से कश्मीरी पंडित परिवार में 19 नवम्बर 1917 को अल्लाहाबाद में हुआ। उनके पिता जवाहरलाल नेहरु, एक बड़े राजनेता थे जिन्होंने स्वतंत्रता पाने के लोए अंग्रेजो से राजनैतिक स्तर पर लड़ाई की थी।
फिर वे अपने राज्य संघ के प्रधानमंत्री और बाद में भारत के प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। इंदिरा, जवाहरलाल नेहरु की अकेली बेटी थी (उसे एक छोटा भाई भी था। लेकिन वो बचपन में ही मारा गया) जो अपनी माता कमला नेहरु के साथ आनंद भवन में बड़ी हुई। जहा अल्लाहाबाद में उनके परिवार की बहुत संपत्ति थी।
इंदिरा का बचपन बहोत नाराज़ और अकेलेपन से भरा पड़ा था। उनके पिता राजनैतिक होने के वजह से कई दिनों से या तो घर से बाहर रहते और या तो जेल में बंद रहते। उनकी माता को बिमारी होने की वजह से वह पलंग पर ही रहती थी। और बाद में उनकी माता को जल्दी ही ट्यूबरकुलोसिस की वजह से मृत्यु प्राप्त हुई। और इंदिरा का अपने पिताजी के साथ बहोत कम संबंध था। ज्यादातर वे पत्र व्यवहार ही रखते थे।
इंदिरा जी को ज्यादातर घर पर ही पढाया जाता था और रुक-रुक कर कभी-कभी वह मेट्रिक के लिए स्कूल चले भी जाती। वह दिल्ली में मॉडर्न स्कूल, सेंट ससिल्लिया और सेंट मैरी क्रिस्चियन कान्वेंट स्कूल, अल्लाहाबाद की विद्यार्थी रह चुकी है। साथ भी एकोले इंटरनेशनल, जिनेवा, एकोले नौवेल्ले, बेक्स और पुपिल्स ओन स्कूल, पुन और बॉम्बे की भी विद्यार्थिनी रह चुकी है।
बाद में वो पढने के लिए शान्तिनिकेतन के विश्वा भारती महाविद्यालय गयी। और उनके साक्षात्कार के समय ही रबिन्द्रनाथ टैगोर ने उनका नाम प्रियदर्शिनी रखा और तभी से वह इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरु के नाम से पहचानी गयी। एक साल बाद उन्होंने वह विश्वविद्यालय अपनी माता के अस्वस्थ होने की वजह से छोड़ दिया और यूरोप चली गयी।
ऐसा कहा जाता है की वहा उन्होंने अपनी पढाई ओक्स्फोर्फ़ विश्वविद्यालय से पूरी की। उनकी माता के मृत्यु के बाद, 1937 में इतिहास की पढाई करने से पहले अपने आप को बैडमिंटन स्कूल में डाला। गांधीजी ने वहा दो बार एंट्रेंस परीक्षा दी क्यू की लैटिन भाषा में उनकी ज्यादा पकड़ नही थी। ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में, वो इतिहास, राजनितिक विज्ञानं और अर्थशास्त्र में अच्छी थी लेकिन लैटिन में इतनी अच्छी नहीं थी जो आवश्यक विषय था उसमे वो इतनी हुशार नहीं थी।
यूरोप में इंदिरा जी को किसी बड़ी बीमारी ने घेर लिया था कई बार डॉक्टर उनकी जाच करने आते-जाते रहता थे। वह जल्द से जल्द ठीक होना चाहती थी ताकि फिर से अपनी पढाई पर ध्यान दे सके। जब नाज़ी आर्मी तेज़ी से यूरोप की परास्त कर रही थी उस समय इंदिरा वहा पढ़ रही थी। इंदिरा जी ने पोर्तुगाल से इंग्लैंड आने के कई प्रयास भी किये लेकिन उनके पास 2 महीने का ही स्टैण्डर्ड बचा हुआ था।
लेकिन 1941 में आखिर वे इंग्लैंड आ ही गयी और वहा से अपनी पढाई पूरी किये बिना ही भारत वापिस आ गयी। बाद में उनके विश्वविद्यालय ने आदरपूर्वक डिग्री प्रदान की।
2010 में, ऑक्सफ़ोर्ड ने 10 आदर्श विद्यार्थियों में उनका नाम लेकर उन्हें सम्मान दिया। इंदिरा ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में एशिया की एक आदर्श महिला थी।
ग्रेट ब्रिटेन में रहते हुए, इंदिरा जी अपने भविष्य में होने वाले पति फिरोज गांधी (जिनका महात्मा गांधी से कोई संबंध नहीं था) से मिली। जिन्हें वो अल्लाहाबाद से जानती थी और जो लन्दन की अर्थशास्त्र स्चूल में पढता था। और बाद में अदि धर्म के अनुसार फिरोज ज़ोरास्त्रियन पारसी परिवार से था। और अल्लाहाबाद में उन दोनों की (इंदिरा नेहरु और फ़िरोज़ गांधी) शादी कर दी गयी।
1950 में शादी के बाद इंदिरा गांधी, अपने प्रधानमंत्री बनने के अभियान में अनाधिकारिक रूप से अपने पिता की वैयक्तिक सहायक के रूप में सेवा करने लगी।
1950 के अंत तक, इंदिरा जी ने कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष के रूप में सेवा की। उन्होंने ने केरला राज्य अलग से बनाने की भी कोशिश की लेकिन 1959 में सरकार ने उसे अस्वीकृत किया। इसका मुख्य उद्देश ये था की इंदिरा जी एक साम्यवादी सरकार बनाना चाहती थी।
1964 में उनके पिता की मृत्यु के बाद उन्हें राज्य सभा का सदस्य नियुक्त किया गया। बाद में वह लाल बहादुर शास्त्री के कैबिनेट की सदस्य बनी और जानकारी अभियान की मंत्री भी बनी।
1966 में शास्त्री की मृत्यु के बाद, कांग्रेस पार्टी ने मोरारजी देसाई की जगह इंदिरा गांधी को अपने नेता के रूप में स्वीकार किया। कांग्रेस पार्टी के अनुभवी व्यक्ति, कामराज ने इंदिरा जी की विजय में उनकी बहोत सहायता की थी।
इंदिरा गांधी एक देशप्रेमी थी। देशसेवा उनमे कूट-कूट के भरी थी। वह हमेशा कहती थी,
“आपको गतिविधि के समय स्थिर रहना और विश्राम के समय क्रियाशील रहना सीख लेना चाहिये।”
मतलब इंसान को कोई भी काम करते समय वो सचेत दिमाग से करना चाहिये। जीवन में क्रियाशील होने के साथ-साथ विश्राम भी जरुरी होता है ताकि हम हमारे दिमाग को और अधिक क्रियाशील बना सके।

एक नजर में इंदिरा गांधी की जानकारी – Information Of Indira Gandhi In Hindi

1930 के सविनय कायदा भंग आंदोलन समय कॉग्रेस के स्वयंसेवको को मदत करने के लिए उन्होंने छोटो बच्चोकी ‘वानरसेना’ स्थापित की।
1942 में ‘चले जाव’ आंदोलन में शामील होने कारन जेल की सजा हुयी।
1955 में राष्ट्रिय कॉग्रेस कार्यकारी सदस्या और 1959 में राष्ट्रिय कॉग्रेस अध्यक्षपद के लिए उनका चुनाव हुवा।
1964 में पंडित नेहरूजी के देहांत के बाद लालबहादुर शास्त्री भारत के पंतप्रधान बने उन्हीके कार्यकाल ये इंदिरा गांधी / Indira Gandhi सूचना और नभोवानी खाते का मंत्री पद संभाला।
1966 मे लालबहादुर शास्त्री जी के निधन के बाद इंदिरा जी का पंतप्रधान पद के लिये चयन हुवा। हिन्दुस्थान के नक़्शे पर प्रथम महिला पंतप्रधान होने का सम्मान मिला।
1969 में कॉग्रेस पार्टी में दरार गिरने के कारन पुराने कॉग्रेस नेताओ के नेतत्व में सिंडिकेट काग्रेस और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में इंडिकेट कॉग्रेस ऐसे दो पार्टियों का जनम हुवा। इसी वर्ष उन्होंने पुरोगामी और लोककल्याणकारी योजनाओ की अमलबजावणी बड़ी ताकत के साथ शुरू की। देश की चौदा बडी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और संस्थानिकोका तनखा रद्द करने का फैसला किया।
1971 में इंदिराजी ने लोकसभा विसर्जन करके लोकसभा की सहायता पूर्व चुनाव की घोषणा की। इस चुनाव में उन्होंने ‘गरीबी हटाव’ की घोषणा दी। इस लोकसभा चुनाव में उनके पक्ष को बहुमत से विजय प्राप्त हुयी। कॉग्रेस पक्ष के सभी सूत्र उनके हाथ में केन्द्रित हुये। और वो कॉग्रेस की सर्वोच्च नेता बनी।
भारत पर बारबार हमला करने वाले पाकिस्तान के पूर्व बंगाल में पीड़ित लोगो को स्वतंत्र करने के लिये सेन्य सहायता करके उन्हें भारतव्देष्टया पाकिस्तानके ‘बांग्लादेश’ और पाकिस्तान ऐसे दो टुकडे किये।
उसके पहले इंदिरा गांधीने पाकिस्तान के अमेरिका से अच्छे संबधो को ध्यान में रखकर बड़ी चतुराई से 1971 में सोव्हिएत यूनियन से बीस साल का ऐतिहासिक ऐसी दोस्ती और परस्परिक सहयोग करार कराया। उनकी ये असामान्य कामगिरी ध्यान में लेकर राष्ट्रपति ने उनका 1971 में ‘भारतरत्न’ इस सर्वोच्च नागरी सम्मान प्रदान करके उनका गौरव किया गया।
1972 में इंदिराजीने पाकिस्तान से व्दिपक्षीय ‘शिमला समझौता’ करके अपना मुस्तद्देगिरी का दर्शन कराया।
1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालयने इंदिराजी के रायबरेली मतदार संघ में से लोकसभा पर चुने जाने को अवैध्य ठराया गया। इंदिरा गांधीने 1975 में आपातकालीन लागु की। पर भारत की लोकशाही प्रेमी जनता उस वजह से नाराज हुयी।
1977 के लोकसभा चुनाव में कॉग्रेस की हार हुयी। खुद इंदिरा गांधी की रायबरेली मतदार संघ मे से हार हुयी। इसका परिणाम ऐसा हुवा जनता पक्ष के हट में सत्ता गयी पर उस पक्ष के और सरकार में के पार्टी घटकों का झगडा होने के कारण 1980 मे मदतपूर्व हुये चुनाव में लोकसभा चुनाव में कॉग्रस ने दैदीप्यमान जीत हुयी। और इंदिराजी ओर एकबार फिर पंतप्रधान बनी।
1982 में दिल्ली में नौवी आशियायी स्पर्धेका यशस्वीरीत्या आयोजन करने में उनका महत्वपूर्ण हिस्सा था।
1983 में नयी दिल्ली में अलिप्तवादी राष्ट्र की परिषद के सातवें शिखर सम्मेलन हुआ। इस परिषद् के पैसे ही असम्बद्ध राष्ट्र आंदोलन का नेतृत्व इंदिरा गांधी इनके तरफ सौपा गया। पाकिस्तान ने चिढानेसे पंजाब के शिख अतिरेकी पंजाब के स्वतंत्र ‘खलिस्तान’ नाम के राष्ट्र निर्माण करणे के लिये नुक़सानदेह कार्यवाही की जा रही थी। शिख अतिरेकी अमृतसर में के स्वर्ण मंदिर जैसे पवित्र जगह पे शस्त्र रखे उस वजह से इंदिरा गांधी / Indira Gandhi ने सुवर्ण मंदिर में सैन्य भिजवाये।
सैनिकी कार्यवाही करके देशद्रोही अतिरेकी को मारना पडा। इस घटने से कुछ लोगो को गुस्सा आया। इसका परिणाम 31 अक्तुबर 1984 में सतवंत सिंग और बेअंत सिंग इन अंगरक्षकों ने गोली मारके उनकी हत्या की।
Indira Gandhi Awards – पुरस्कार: 1971 में ‘भारतरत्न’।
Indira Gandhi विशेषता:
  • भारत की पहली महिला पंतप्रधान
  • भारत रत्न मिलने वाली पहली महिला
Indira Gandhi Death – मृत्यु: 31 अक्तुबर 1984 को उनकी मौत हुयी।
“भारत की नागरिकता एक साझी नागरिकता है। अगर एक भी नागरिक के लिए कोई ख़तरा पैदा होता है। चाहे वह जिस समुदाय, जाति, धर्म या भाषा समूह का हो तो वह ख़तरा हम सबके लिए है।और सबसे ख़राब बात यह है की यह स्थिति हमारी प्रतिष्ठा घटाती है।”
                    ~ इन्दिरा गांधी
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गेंदबाजी करनेवाले कुलदीप यादव | Kuldeep Yadav Biography

गेंदबाजी करनेवाले कुलदीप यादव | Kuldeep Yadav Biography-

Kuldeep Yadav – कुलदीप यादव भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्थर पर क्रिकेट खेलनेवाले बाये हाथ के खिलाडी है। उन्होंने अपना पहला टेस्ट मैच ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ और उस मैच के पहले ही पारी में उन्होंने 4 विकेट लेकर अपना नाम दुनिया के नज़र में लाया और सभी को चौका दिया।

चाइनामन गेंदबाजी करनेवाले कुलदीप यादव – Kuldeep Yadav Biography

कुलदीप यादव का जन्म 14 दिसंबर 1994 को उत्तर प्रदेश के कानपूर में हुआ। उनके पिता का नाम राम सिंह यादव और माता का नाम श्रीमती ऊषा यादव है।

कुलदीप यादव का करियर – Kuldeep Yadav Career

कुलदीप यादव ने कानपूर में अपने करियर की शुरुवात की थी। वह शुरुवात में तेज गेंदबाजी करते थे। लेकिन बाद में अपने कोच के कहने पर उन्होंने अलग तरह् की गेंदबाजी को अपनाया। उनकी इस खास गेंदबाजी को चाइनामन गेंदबाजी कहते है।
कुलदीप ने प्रथम श्रेणी के 22 मेचेस खेले है जिनमे उनका बल्लेबाजी का औसत 28.92 है और गेंदबाजी का औसत 33.11 है। वो काफ़ी प्रतिभाशाली और युवा गेंदबाज है। वो बहुत सारी टीम के लिए खेल चुके है जैसे की सेंट्रल जोन, इंडिया अंडर 19, मुंबई इंडियन्स, उत्तर प्रदेश अंडर 19 और अभी कुलदीप यादव कोलकाता नाइट रायडर्स के लिए खेलते है।
9 जुलाई 2017 को उन्होंने टी20 का पहला मैच वेस्ट इंडीज के खिलाफ खेला था। 25 मार्च 2017 को कुलदीप यादव ने उनके करियर का पहला टेस्ट मैच ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ धर्मशाला में खेला था। उस मैच के पहले ही पारी में उन्होंने 4 विकेट लिए थे।
उन्होंने पहला एकदिवसीय मैच वेस्ट इंडीज के खिलाफ खेला था लेकिन ऊन्हे गेंदबाजी करने का मौका ही नहीं मिला। लेकिन उसके अगले ही मैच में उन्होंने 3 विकेट लिए।
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टॉलीवुड के सबसे स्टाइलिश स्टार अल्लू अर्जुन | Allu Arjun Biography

टॉलीवुड के सबसे स्टाइलिश स्टार अल्लू अर्जुन | Allu Arjun Biography-

Allu Arjun – अल्लू अर्जुन तेलुगु फिल्मो के अभिनेता, निर्माता, डांसर, और प्लेबैक सिंगर है। आंध्रप्रदेश और केरला में ही नहीं बल्क़ि पुरे भारत देश में इनके बहुत से फैन है। अल्लू अर्जुन को केरल में मल्लू अर्जुन कहा जाता है।

टॉलीवुड के सबसे स्टाइलिश स्टार अल्लू अर्जुन – Allu Arjun Biography

अल्लू अर्जुन का जन्म तमिलनाडू के चेन्नई में हुआ। इनके पिता अल्लू अरविंद फ़िल्म निर्माता है। इनके दादाजी अल्लू रामा लिंगैया फिल्मो में कॉमेडियन का काम करते थे। इनकी बुवा की शादी चिरंजीवी से हुई।
अल्लू अर्जुन बहुत ही अच्छे स्वभाव के इन्सान है और हसी मजाक करने में तो माहिर है। इन्हें बचपन से नाचने का बड़ा शौक था। लेकिन पढाई में ज्यादा होशियार नहीं थे।
इन्होने प्राथमिक शिक्षा पीबीबीएस स्कूल और सेंट पेट्रिक स्कूल में पूरी की। इसके बाद अल्लू अर्जुन ए. एम. एम. स्कूल में पढ़े और बाद में इन्होने पढाई बिच में ही रोक दी और शाम के समय किसी संस्था में जाना शुरू कर दिया था जिसके कारण इन्होने कैसे तो भी 10 वी की पढाई पूरी कर ली और आगे की पढाई बंद कर दी।
हम सब सोचते है की शिक्षा हमें अच्छा इन्सान बनाती। लेकिन अल्लु पढाई में साधारण होने के बावजूद भी अच्छे इन्सान है। इन्हें बाहर घूमना बहुत अच्छा लगता है और दोस्तों के साथ समय बिताना इनका पसंदीदा काम है।
6 मार्च 2011 को हैदराबाद में अर्जुन ने स्नेहा रेड्डी से शादी की। इन्हें एक लड़का है जिसका नाम आयान है और लड़की का नाम आरहा है।

अल्लू अर्जुन का फ़िल्मी करियर – Allu Arjun Career

2003 में आयी फ़िल्म गंगोत्री से इन्होने फ़िल्मी करियर की शुरुवात की। इस फ़िल्म के लिए इन्हें दो पुरस्कार भी मिले।
वो टोलीवुड के एकमात्र ऐसे अभिनेता जिन्होंने 14 फिल्म अभिनेत्री के साथ काम किया। और खास बात यह है की इन 14 अभिनेत्री के साथ एक बार काम करने के बाद दुबारा उस अभिनेत्री के साथ काम नहीं किया।
इनके करियर में बहुत सारे उतार चढाव आये। कामयाबी और असफलता दोनों का भी अल्लू अर्जुन ने अनुभव लिया। लेकिन फिर भी इन्होने परिस्थितियों को संभालकर काम पर ध्यान दिया। फ़िल्म बनाते वक्त वो अपना सर्वश्रेष्ठ देते है। वो एक महान डांसर है और इसीलिए इन्हें दक्षिण के माइकल जैक्सन कहते है।
नाचना इन्हें बहुत ही पसंद है और इनके इसी बात से सभी इन्हें बहुत प्यार करते है। वो काफ़ी व्यवहारिक इन्सान है और हमेशा नए कलाकारों को आगे लाने की कोशिश करते है।
इन्होने चक्र, कीरावानी और बहुत सारे निर्देशकों के साथ मिलकर काम किया। उम्र के 11 साल से वो इस फ़िल्मी दुनिया में काम कर रहे है और हर बार अपने आपमे निखार लाने की कोशिश में रहते है। वो पडदे पर और पडदे के पीछे भी बहुत स्टाइलिश रहते है और शायद इसीलिए सभी इन्हें स्टाइलिश स्टार अल्लू अर्जुन कहते है। इनके सबसे ज्यादा चाहने वाले लोग केरल में है और इसीलिए केरल में इन्हें मल्लू अर्जुन कहते है।
इन्होने बहुत फिल्मो में मेहमान के रूप में काम किया जैसे की डैडी और शंकर दादा जिंदाबाद। इन्होने 2014 में काजल के साथ मिलकर फ़िल्म में मेहमान के रूप काम किया और उस फ़िल्म में पूरी जान डाल दी। वो काम सिर्फ़ इन्होने राम चरण के खातिर किया था। और इसका नतीजा भी काफ़ी हैरान करनेवाला था। लोगों ने उस फ़िल्म को बहुत पसंद किया।

अल्लू अर्जुन को मिले हुए पुरस्कार – Allu Arjun Awards

  • नंदी अवार्ड – आर्या (2005) – नंदी स्पेशल जूरी अवार्ड
  • नंदी अवार्ड – आर्या 2 (2005) – नंदी स्पेशल जूरी अवार्ड
  • फ़िल्मफेयर अवार्ड साउथ – परुगु (2009) – सर्वश्रेष्ठ तेलेगु अभिनेता के लिए फिल्मफेयर अवार्ड
  • फिल्मफेयर अवार्ड साउथ – वेदं (2011) – सर्वश्रेष्ट तेलुगु अभिनेता के लिए फ़िल्मफेयर अवार्ड
  • फ़िल्मफेयर अवार्ड साउथ – रेसगरम (2015) – सर्वश्रेष्ट तेलुगु अभिनेता के लिए फ़िल्म फेयर अवार्ड
अल्लू अर्जुन की फिल्मोग्राफी – Allu Arjun Movies List
  • विजेता (1985)
  • डैडी (2001)
  • गंगोत्री (2003)
  • आर्या (2004)
  • बन्नी (2005)
  • हैप्पी (2005)
  • देसमुद्रू (2006)
  • परुगु (2007)
  • शंकरदादा जिंदाबाद (2007)
  • आर्या 2 (2009)
  • वरुदु (2010)
  • वेदं (2010)
  • बद्रीनाथ (2011)
  • जुलाई (2012)
  • इद्दरामायीलाठो (2013)
  • येवादु (2014)
  • रेस गरम (2014)
  • आई ऍम देट चेंज (2014)
  • एस/ओ सत्यमूर्ति (2015)
  • रुद्रमदेवी (2015)
  • मगधीरा (2015)
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस जीवनी | Netaji Subhash Chandra Bose Biography In Hindi

नेताजी सुभाषचंद्र बोस जीवनी | Netaji Subhash Chandra Bose Biography In Hindi-

स्वतंत्रता अभियान के एक और महान क्रान्तिकारियो में सुभाष चंद्र बोस – Netaji Subhash Chandra Bose का नाम भी आता है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय सेना का निर्माण किया था। जो विशेषतः “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से प्रसिद्ध थी। सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद को बहोत मानते थे।
“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा” सुभाष चंद्र बोस का ये प्रसिद्ध नारा था। उन्होंने अपने स्वतंत्रता अभियान में बहोत से प्रेरणादायक भाषण दिये और भारत के लोगो को आज़ादी के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

सुभाषचंद्र बोस की जीवनी / About Netaji Subhash Chandra Bose In Hindi

पूरा नाम  – सुभाषचंद्र जानकीनाथ बोस
जन्म       – 23 जनवरी 1897
जन्मस्थान – कटक (ओरिसा)
पिता       – जानकीनाथ
माता       – प्रभावती देवी
शिक्षा      – 1919 में बी.ए. 1920 में आय.सी.एस. परिक्षा उत्तीर्ण।
सुभास चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। जिनकी निडर देशभक्ति ने उन्हें देश का हीरो बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था।
बाद में सम्माननीय नेताजी ने पहले जर्मनी की सहायता लेते हुए जर्मन में ही विशेष भारतीय सैनिक कार्यालय की स्थापना बर्लिन में 1942 के प्रारम्भ में की, जिसका 1990 में भी उपयोग किया गया था।
शुरू में 1920 के अंत ने बीसे राष्ट्रिय युवा कांग्रेस के उग्र नेता थे एवं 1938 और 1939 को वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। लेकिन बाद में कुछ समय बाद ही 1939 में उन्हें महात्मा गांधी / Mahatma Gandhi से चल से विवाद के कारण अपने पद को छोडना पड़ा। लेकिन 1940 में भारत छोड़ने से पहले ही उन्हें ब्रिटिश ने अपने गिरफ्त में कर लिया था। अप्रैल 1941 को बोस को जर्मनी लाया गया।
जहा उन्हें भारतीय स्वतंत्रता अभियान की बागडोर संभाली, और भारत को आजादी दिलाने के लिये लोगो को एकजुट करने लगे और एकता के सूत्र में बांधने लगे।
नवंबर 1941 में, जर्मन पैसो से ही उन्होंने बर्लिन में इंडिया सेंटर की स्थापना की और कुछ ही दिनों बाद फ्री इंडिया रेडियो की भी स्थापना की, जिसपर रोज़ रात को बोस अपना कार्यक्रम किया करते। तक़रीबन 3000 मजबुत स्वयं सेवी सैनिको ने इरविन रोमेल्स द्वारा हथियाए अफ्रीका कॉर्प्स को अपने कब्जे में किया।
बाद में बोस को जर्मन से बहोत सहायता मिली और उन्होंने भारत की खोज के लिये जर्मन जमीन का भी उपयोग किया। इसी दौरान बोस पिता भी बने, उनकी पत्नी और सहयोगी एमिली स्किनल, जिनसे वे 1934 में मिले थे। उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया। 1942 की बसंत से, जापानियों ने दक्षिणी एशिया को हथिया लिया था और वे जर्मन प्राथमिकताओं को बदलने लगे थे। बाद में भारत पर हुआ जर्मन हमला असहनीय बनता गया।
इसे देखते हुए बोस ने दक्षिणी एशिया जाने का निर्णय लिया। अडोल्फ़ हिटलर उसी समय 1942 के अंत में बोस से मिले थे। और उन्होंने भी बोस को दक्षिणी एशिया जाने की सलाह दी और पनडुब्बी लेने की भी सलाह दी। बोस ने अच्छी तरह से एक्सिस ताकत को जान लिया था और खेदसूचक ढंग से वह ज्यादा देर तक नही टिक पाई।
फेब्रुअरी 1943 में बोस जर्मन पनडुब्बियों पर पहुचें। मैडागास्कर में, उन्हें जापानीज पनडुब्बी में स्थानांतरित किया गया। जहा मई 1943 में वे जापानीज स्थान सुमात्रा में उतरे।
जापानियों की सहायता से ही सुभाष चंद्र बोस – Subhash Chandra Bose ने इंडियन नेशनल आर्मी (INA) का पुनर्निर्माण किया। जिसमे ब्रिटिश इंडियन आर्मी के भारतीय सैनिक भी शामिल थे। जिन्होंने सिंगापुर युद्ध में महान कार्य किया था। इस तरह बोस के आने से मलैया और सिंगापुर में भारतीय नागरीकों की संख्या बढ़ने लगी।
बोस के नेतृत्व में जापानीज भारतीय सरकार को विभिन्न क्षेत्रो में सहायता करने के लिये राजी हुए। जैसे की उन्होंने बर्मा की सहायता की थी। और साथ ही जैसा साथ उन्होंने फिलीपींस और मांचुकुओ का दिया था। उन्होंने भारत की अस्थाई सरकार, जिसे बोस प्रतिपादित कर रहे थे, की स्थापना जापानीयो के साथ मिलकर अंडमान और निकबर में की।
बोस अच्छी तरह से अपनी सेना का नेतृत्व कर रहे थे – उनमे काफी करिश्माई ताकत समायी थी। इसी के चलते उन्होंने प्रसिद्ध भारतीय नारे “जय हिन्द” की घोषणा की। और उसे अपनी आर्मी का नारा बनाया। उनकें नेतृत्व में निर्मित इंडियन नेशनल आर्मी एकता और समाजसेवा की भावना से बनी थी। उनकी सेना में भेदभाव और धर्मभेद की जरा भी भावना नही थी। इसे देखते हुए जापानियों ने बोस को अकुशल सैनिक बताया। और इसी वजह से वे अपनी आर्मी को ज्यादा समय तक नही टिका पाये।
1944 के अंत में और 1945 के प्रारम्भ में ब्रिटिश इंडियन आर्मी पहले तो रुकी थी लेकिन बाद में उन्होंने पुनः भारत पर आक्रमण किया। जिसमे लगभग आधी जापानी शक्ति और इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल आधे जापानी सैनिक मारे गए। बाद में इंडियन नेशनल आर्मी मलय पेनिनसुला गयी जहा सिंगापुर में उन्हें देखा गया था और उन्होंने स्वयं ही खुद को जापानियों के हवाले कर दिया था। बोस ने पहले जापानियों के डर से आत्मसमपर्ण का निर्णय नही लिया था। बल्कि उन्होंने भागकर मंचूरिया जाने की बजाये सोवियत संघ के भविष्य के लिये आत्मसमर्पण करने की ठानी।
ताइवान में हुए विमान अपघात में उनकी मृत्यु हो गयी थी। लेकिन आज भी बहोत से भारतीयो को इस बात पर विश्वास नही की उनका विमान हादसा वास्तव में हुआ था भी या नही। उस समय हादसे के बाद भी भारतीय बंगाल प्रान्त के लोगो को भरोसा था की बोस भारत की आजादी के लिये दोबारा आएंगे।
रंगून के ‘जुबली हॉल’ में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया वह भाषण सदैव के लिए इतिहास के पत्रों में अंकित हो गया। जिसमें उन्होंने कहा था कि- “स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है। किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है।
आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है। जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें।
“तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा – “हम अपना ख़ून देंगे” उन्होंने आईएनए को ‘दिल्ली चलो’ का नारा भी दिया। सुभाष भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारत की अमूल्य निधि थे। ‘जय हिन्द’ का नारा और अभिवादन उन्हीं की देन है।
सुभाष चंद्र बोस के ये घोषवाक्य आज भी हमें रोमांचित करते है। यही एक वाक्य सिद्ध करता है कि जिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवन का व्यक्ति होगा।
‘इंडियन नेशनल आर्मी’ के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी रहस्य छाया हुआ है। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में मानी जाती है। समय गुजरने के साथ ही भारत में भी अधिकांश लोग ये मानते है कि नेताजी की मौत ताईपे में विमान हादसे में हुई।
कहा जाता है की 18 अगस्त 1945 को यह हादसा ताइवान में हुआ था। लेकिन फिर भी बहोत से लोगो को इस बात पर भरोसा नही था।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे, जिनकी ज़रूरत कल थी। आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जिसका वह हक़दार है। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, मां भारती के सच्चे सपूत थे।
नेताजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक थे। जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे। जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की थी।
नेताजी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेताजी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे। उनकी बोलने की शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ चलाया। नेताजी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। उनकी व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।

एक नजर में सुभाषचंद्र बोस का इतिहास / Netaji Subhash Chandra Bose History In Hindi

1) 1921 में सुभाषचंद्र बोस / Subhash Chandra Bose इन्होंने सरकारी नोकरी में बहोत उच्च स्थान का त्याग करके राष्ट्रीय स्वातंत्र के आंदोलन में कुद पडे। स्वातंत्र लढाई में हिस्सा लेने के लिये अपनी नौकरी का इस्तीफा देणे वाले वो पहले आय.सी.एस. अधिकारी थे।
2) 1924 में कोलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में उनको चित्तरंजन दास इन्होंने चुना। पर इसी स्थान होकर और कौनसा भी सबुत न होकर अंग्रेज सरकार ने क्रांतीकारोयों के साथ सबंध रखा ये इल्जाम लगाकर उन्हें गिरफ्तार मंडाले के जेल में भेजा गया।
3) 1927 में सुभाषचंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू इन दो युवा नेताओं को कॉंग्रेस के महासचिव के रूप में चुना गया। इस चुनाव के वजह से देशके युवाओं में बड़ी चेतना बढ़ी।
4) सुभाषचंद्र बोस इन्होंने समझौते के स्वातंत्र के अलावा पुरे स्वातंत्र की मांग कॉंग्रेस ने ब्रिटिशों से करनी चाहिये। ऐसा आग्रह किया। 1929 के लाहोर अधिवेशन में कॉंग्रेस ने पूरा स्वातंत्र का संकल्प पारित किया। ये संकल्प पारित होने में सुभाषचंद्र बोस इन्होंने बहोत प्रयास किये।
5) 1938 में सुभाषचंद्र बोस हरिपुरा कॉंग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष बने।
6) 1939 में त्रिपुरा यहा हुये कॉंग्रेस के अधिवेशन में वो गांधीजी के उमेदवार डॉ. पट्टाभि सीतारामय्या इनको घर दिलाकर चुनकर आये। पर गांधीजी के अनुयायी उनको सहकार्य नहीं करते थे। तब उन्होंने उस स्थान का इस्तीफा दिया और ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ ये नया पक्ष स्थापन किया।
7) इंग्लंड दुसरे महायुध्द में फसा हुवा है। इस स्थिति का लाभ लेकर स्वातंत्र के लिए भारत ने सशस्त्र लढाई करनी चाहिए’ ऐसा प्रचार वो करते थे। इस वजह से अंग्रेज सरकार का उनके उपर का गुस्सा बढ़ा। सरकारने उन्हें जेल में डाला पर उनकी तबियत खराब होने के वजह से उन्हें घर पर ही नजर कैद में रखा। 15 जनवरी १९४१ में सुभाषबाबू भेस बदलकर अग्रेजोंके चंगुल से भाग गये। काबुल के रास्ते से जर्मनी की राजधानी बर्लिन यहा गये।
8) भारत के स्वातंत्र लढाई के लिये सुभाषबाबू ने हिटलर के साथ बातचीत की। जर्मनी में ‘आझाद हिंद रेडिओ केंद्र’ शुरु किया। इस केंद्र से अंग्रेज के विरोध में राष्ट्रव्यापी संकल्प करने का संदेश वो भारतीयोंको देने लगे।
9) जर्मनी में रहकर भारतीय स्वतंत्र के लिये हम कुछ महत्वपूर्ण रूप की कृति कर सकेंगे। ऐसा ध्यान में आतेही सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से एक पनडुब्बी से जपान गये। रासबिहारी बोस ये भारतीय क्रांतिकारी उस समय जपान में रहते थे। उन्होंने मलेशिया, सिंगापूर, म्यानमार आदी। पूर्व आशियायी देशों में के भारतीयोका ‘इंडियन इंडिपेंडेंट लीग‘ (हिंदी स्वातंत्र संघ) स्थापन किया हुवा था।
जपान इ हिंदी के हाथ में आये हुये अंग्रेजो के लष्कर में के हिंदी सैनिकोकी ‘आझाद हिंद सेना’ उन्होंने संघटित की थी। उसका नेतृत्व स्वीकार करने की सुभाषबाबू को रासबिहारी बोस ने उन्होंने आवेदन किया। नेताजीने वो आवेदन स्वीकार किया। इस तरह सुभाषचंद्र बोस आझाद हिंद सेने के सरसेनापती बने।
10) 1943 में अक्तुबर महीने में सुभाषबाबू के अध्यक्षता में ‘आझाद हिंद सरकार’ की स्थापना हुयी। अंदमान और निकोबार इन व्दिपो कब्जा कटके आझाद हिंद सरकार ने वहा तिरंगा लहरा दिया। अंदमान को ‘शहीद व्दिप’ और निकोबार को ‘स्वराज्य व्दिप’ ऐसे नाम दिये। जगन्नाथराव भोसले, शहनवाझ खान, प्रेम कुमार सहगल, डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन आदी उनके पास के साथी थे। डॉ. लक्ष्मी स्वामी नाथन ये ‘झाशी की राणी’ पथक के प्रमुख थी।
तिरंगा झेंडा’ ये आझाद हिंद सेन का निशान ‘जयहिंद’ ये अभिवादन के शब्द, ‘चलो दिल्ली’ ये घोष वाक्य और ‘कदम कदम बढाये जा’ ये समरगित था। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेजों से युध्द किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने को मजबूर किया।
11) जपान सरकार के निवेदन के अनुसार सुभाषचंद्र बोस एक विमान से टोकियो जाने के लिये निकले उस विमान को फोर्मोसा मतलब ताइहोकू व्दिप के हवाई अड्डे के पास दुर्घटना हुयी। इस दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को नैताजी की मृत्यु हो गयी।
बचपन से ही सुभाष में राष्ट्रीयता के लक्षण प्रकट होने लगे थे और निस्वार्थ सेवा भावना उनके चरित्र की विशेषता थी। इन सभी उदात्त प्रवुत्तियों से ही उनके क्रांतिकारी पर उदार व्यक्तित्व का निर्माण हुआ था।
पुरस्कार: Subhash Chandra Bose awards:
भारत सरकार ने 1992 में सुभाषबाबू को भारतरत्न ये सर्वोच्च सम्मान की घोषणा की गयी लेकिन बोस परिवार वालोने वो स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।
मृत्यु -Subhash Chandra Bose Died:
18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में सुभाषबाबू की मौत हुयी।
Subhash Chandra Bose भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते है। वे भारत की अमूल्य निधि थे। ‘जयहिन्द’ का नारा और अभिवादन उन्ही की देंन है। उनकी प्रसिध्द पंक्तियाँ है – “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हेँ आजादी दूंगा।”
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