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Monday, 11 December 2017

स्वामी विवेकानंद की प्रेरक जीवनी | Swami Vivekananda in Hindi

स्वामी विवेकानंद की प्रेरक जीवनी | Swami Vivekananda in Hindi-


क युवा संन्यासी के रूप में भारतीय संस्कृति की सुगंध विदेशों में बिखेरनें वाले स्वामी विवेकानंद साहित्य, दर्शन और इतिहास के प्रकाण्ड विव्दान थे। स्वामी विवेकानंद – Swami Vivekananda ने ‘योग’‘राजयोग’ तथा ‘ज्ञानयोग’ जैसे ग्रंथों की रचना करके युवा जगत को एक नई राह दिखाई है जिसका प्रभाव जनमानस पर युगों-युगों तक छाया रहेगा। कन्याकुमारी में निर्मित उनका स्मारक आज भी स्वामी विवेकानंद – Swami Vivekananda महानता की कहानी कर रहा है।

स्वामी विवेकानंद की प्रेरक जीवनी – Swami Vivekananda biography in Hindi

पूरा नाम  – नरेंद्रनाथ विश्वनाथ दत्त
जन्म       – 12 जनवरी 1863
जन्मस्थान – कलकत्ता (पं. बंगाल)
पिता       – विश्वनाथ दत्त
माता       – भुवनेश्वरी देवी
शिक्षा      – 1884 मे बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण
विवाह     –  विवाह नहीं किया.
स्वामी विवेकानंद जन्मनाम नरेंद्र नाथ दत्त भारतीय हिंदु सन्यासी और 19 वी शताब्दी के संत रामकृष्ण के मुख्य शिष्य थे। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण दर्शन विदेशो में स्वामी विवेकानंद की वक्तृता के कारण ही पहोचा। भारत में हिंदु धर्म को बढ़ाने में उनकी मुख्य भूमिका रही और भारत को औपनिवेशक बनाने में उनका मुख्य सहयोग रहा।
विवेकानंद ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो आज भी भारत में सफलता पूर्वक चल रहा है। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुवात “मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनों” के साथ करने के लिए जाना जाता है। जो शिकागो विश्व धर्म सम्मलेन में उन्होंने ने हिंदु धर्म की पहचान कराते हुए कहे थे।
उनका जन्म कलकत्ता के बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। स्वामीजी का ध्यान बचपन से ही आध्यात्मिकता की और था। उनके गुरु रामकृष्ण का उनपर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा, जिनसे उन्होंने जीवन जीने का सही उद्देश जाना, स्वयम की आत्मा को जाना और भगवान की सही परिभाषा को जानकर उनकी सेवा की और सतत अपने दिमाग को को भगवान के ध्यान में लगाये रखा।
रामकृष्ण की मृत्यु के पश्च्यात, विवेकानंद ने विस्तृत रूप से भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की और ब्रिटिश कालीन भारत में लोगो की परिस्थितियों को जाना, उसे समझा। बाद में उन्होंने यूनाइटेड स्टेट की यात्रा जहा उन्होंने 1893 में विश्व धर्म सम्मलेन में भारतीयों के हिंदु धर्म का प्रतिनिधित्व किया।
विवेकानंद ने यूरोप, इंग्लैंड और यूनाइटेड स्टेट में हिंदु शास्त्र की 100 से भी अधिक सामाजिक और वैयक्तिक क्लासेस ली और भाषण भी दिए। भारत में विवेकानंद एक देशभक्त संत के नाम से जाने जाते है और उनका जन्मदिन राष्ट्रिय युवा दिन के रूप में मनाया जाता है।

प्रारंभिक जीवन, जन्म और बचपन – Swami Vivekananda life history

Swami Vivekananda का जन्म नरेन्द्रनाथ दत्ता (नरेंद्र, नरेन्) के नाम से 12 जनवरी 1863 को मकर संक्रांति के समय उनके पैतृक घर कलकत्ता के गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट में हुआ, जो ब्रिटिशकालीन भारत की राजधानी थी।
उनका परिवार एक पारंपरिक कायस्थ परिवार था, विवेकानंद के 9 भाई-बहन थे। उनके पिता, विश्वनाथ दत्ता, कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील थे। दुर्गाचरण दत्ता जो नरेन्द्र के दादा थे, वे संस्कृत और पारसी के विद्वान थे जिन्होंने 25 साल की उम्र में अपना परिवार और घर छोड़कर एक सन्यासी का जीवन स्वीकार कर लिया था। उनकी माता, भुवनेश्वरी देवी एक देवभक्त गृहिणी थी।
स्वामीजी के माता और पिता के अच्छे संस्कारो और अच्छी परवरिश के कारण स्वामीजी के जीवन को एक अच्छा आकार और एक उच्चकोटि की सोच मिली।
युवा दिनों से ही उनमे आध्यात्मिकता के क्षेत्र में रूचि थी, वे हमेशा भगवान की तस्वीरों जैसे शिव, राम और सीता के सामने ध्यान लगाकर साधना करते थे। साधुओ और सन्यासियों की बाते उन्हें हमेशा प्रेरित करती रही।
नरेंद्र बचपन से ही बहोत शरारती और कुशल बालक थे, उनके माता पिता को कई बार उन्हें सँभालने और समझने में परेशानी होती थी। उनकी माता हमेशा कहती थी की, “मैंने शिवजी से एक पुत्र की प्रार्थना की थी, और उन्होंने तो मुझे एक शैतान ही दे दिया”।

स्वामी विवेकानंद शिक्षा – Swami Vivekananda Education

1871 में, 8 साल की आयु में Swami Vivekananda को ईश्वर चन्द्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूट में डाला गया, 1877 में जब उनका परिवार रायपुर स्थापित हुआ तब तक नरेंद्र ने उस स्कूल से शिक्षा ग्रहण की। 1879 में, उनके परिवार के कलकत्ता वापिस आ जाने के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज की एंट्रेंस परीक्षा में फर्स्ट डिवीज़न लाने वाले वे पहले विद्यार्थी बने।
वे विभिन्न विषयो जैसे दर्शन शास्त्र, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञानं, कला और साहित्य के उत्सुक पाठक थे हिंदु धर्मग्रंथो में भी उनकी बहोत रूचि थी जैसे वेद, उपनिषद, भगवत गीता, रामायण, महाभारत और पुराण। नरेंद्र भारतीय पारंपरिक संगीत में निपुण थे, और हमेशा शारीरिक योग, खेल और सभी गतिविधियों में सहभागी होते थे।
नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी जीवन और यूरोपियन इतिहास की भी पढाई जनरल असेंबली इंस्टिट्यूट से कर रखी थी। 1881 में, उन्होंने ललित कला की परीक्षा पास की, और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी की।
नरेंद्र ने David Hume, Immanuel Kant, Johann Gottlieb Fichte, Baruch Spinoza, Georg W.F. Hegel, Arthur Schopenhauer, Auguste Comte, John Stuart Mill और Charles Darwin के कामो का भी अभ्यास कर रखा था। वे Herbert Spencer के विकास सिद्धांत से मन्त्र मुग्ध हो गये थे और उन्ही के समान वे बनना चाहते थे, उन्होंने Spencer की शिक्षा किताब (1861) को बंगाली में भी परिभाषित किया। जब वे पश्चिमी दर्शन शास्त्रियों का अभ्यास कर रहे थे तब उन्होंने संस्कृत ग्रंथो और बंगाली साहित्यों को भी पढ़ा।
William Hastie (जनरल असेंबली संस्था के अध्यक्ष) ने ये लिखा की, “नरेंद्र सच में बहोत होशियार है, मैंने कई यात्राये की बहोत दूर तक गया लेकिन मै और जर्मन विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी भी कभी नरेंद्र के दिमाग और कुशलता के आगे नहीं जा सके”। कुछ लोग नरेंद्र को श्रुतिधरा (भयंकर स्मरण शक्ति वाला व्यक्ति) कहकर बुलाते थे।

रामकृष्ण के साथ – Swami Vivekananda Teacher Ramakrushna

1881 में नरेंद्र पहली बार रामकृष्ण से मिले, जिन्होंने नरेंद्र के पिता की मृत्यु पश्च्यात मुख्य रूप से नरेंद्र पर आध्यात्मिक प्रकाश डाला।
जब William Hastie जनरल असेंबली संस्था में William Wordsworth की कविता “पर्यटन” पर भाषण दे रहे थे, तब नरेंद्र ने अपने आप को रामकृष्ण से परिचित करवाया था। जब वे कविता के एक शब्द “Trance” का मतलब समझा रहे थे, तब उन्होंने अपने विद्यार्थियों से कहा की वे इसका मतलब जानने के लिए दक्षिणेश्वर में स्थित रामकृष्ण से मिले। उनकी इस बात ने कई विद्यार्थियों को रामकृष्ण से मिलने प्रेरित किया, जिसमे नरेंद्र भी शामिल थे।
वे व्यक्तिगत रूप से नवम्बर 1881 में मिले, लेकिन नरेंद्र उसे अपनी रामकृष्ण के साथ पहली मुलाकात नहीं मानते, और ना ही कभी किसी ने उस मुलाकात को नरेंद्र और रामकृष्ण की पहली मुलाकात के रूप में देखा। उस समय नरेंद्र अपनी आने वाली F.A.(ललित कला) परीक्षा की तयारी कर रहे थे।
जब रामकृष्ण को सुरेन्द्र नाथ मित्र के घर अपना भाषण देने जाना था, तब उन्होंने नरेंद्र को अपने साथ ही रखा। परांजपे के अनुसार, ”उस मुलाकात में रामकृष्ण ने युवा नरेंद्र को कुछ गाने के लिए कहा था। और उनके गाने की कला से मोहित होकर उन्होंने नरेंद्र को अपने साथ दक्षिणेश्वर चलने कहा।
1881 के अंत और 1882 में प्रारंभ में, नरेंद्र अपने दो मित्रो के साथ दक्षिणेश्वर गये और वह वे रामकृष्ण से मिले। उनकी यह मुलाकात उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग-पॉइंट बना।
उन्होंने जल्द ही रामकृष्ण को अपने गुरु के रूप में स्वीकार नही किया, और ना ही उनके विचारो के विरुद्ध कभी गये। वे तो बस उनके चरित्र से प्रभावित थे इसीलिए जल्दी से दक्षिणेश्वर चले गये। उन्होंने जल्द ही रामकृष्ण के परम आनंद और स्वप्न को ”कल्पनाशक्ति की मनगढ़त बातो” और “मतिभ्रम” के रूप में देखा।
ब्रह्म समाज के सदस्य के रूप में, वे मूर्ति पूजा, बहुदेववाद और रामकृष्ण की काली देवी के पूजा के विरुद्ध थे। उन्होंने अद्वैत वेदांत के “पूर्णतया समान समझना” को इश्वर निंदा और पागलपंती समझते हुए अस्वीकार किया और उनका उपहास भी उड़ाया। नरेंद्र ने रामकृष्ण की परीक्षा भी ली, जिन्होंने (रामकृष्ण) उस विवाद को धैर्यपूर्वक सहते हुए कहा, ”सभी दृष्टिकोणों से सत्य जानने का प्रयास करे”।
नरेंद्र के पिता की 1884 में अचानक मृत्यु हो गयी और परिवार दिवालिया बन गया था, साहूकार दिए हुए कर्जे को वापिस करने की मांग कर रहे थे, और उनके रिश्तेदारों ने भी उनके पूर्वजो के घर से उनके अधिकारों को हटा दिया था। नरेंद्र अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा करना चाहते थे, वे अपने महाविद्यालय के सबसे गरीब विद्यार्थी बन चुके थे।
असफलता पूर्वक वे कोई काम ढूंडने में लग गये और भगवान के अस्तित्व का प्रश्न उनके सामने निर्मित हुआ, जहा रामकृष्ण के पास उन्हें तसल्ली मिली और उन्होंने दक्षिणेश्वर जाना बढ़ा दिया।
एक दिन नरेंद्र ने रामकृष्ण से उनके परिवार के आर्थिक भलाई के लिए काली माता से प्रार्थना करने कहा। और रामकृष्ण की सलाह से वे तिन बार मंदिर गये, लेकिन वे हर बार उन्हें जिसकी जरुरत है वो मांगने में असफल हुए और उन्होंने खुद को सच्चाई के मार्ग पर ले जाने और लोगो की भलाई करने की प्रार्थना की। उस समय पहल;ई बार नरेंद्र ने भगवान् की अनुभूति की थी और उसी समय से नरेंद्र ने रामकृष्ण को अपना गुरु मान लिया था।
1885 में, रामकृष्ण को गले का कैंसर हुआ, और इस वजह से उन्हें कलकत्ता जाना पड़ा और बाद में कोस्सिपोरे गार्डन जाना पड़ा। नरेंद्र और उनके अन्य साथियों ने रामकृष्ण के अंतिम दिनों में उनकी सेवा की, और साथ ही नरेंद्र की आध्यात्मिक शिक्षा भी शुरू थी। कोस्सिपोरे में नरेंद्र ने निर्विकल्प समाधी का अनुभव लिया।
नरेंद्र और उनके अन्य शिष्यों ने रामकृष्ण से भगवा पोशाक लिया, तपस्वी के समान उनकी आज्ञा का पालन करते रहे। रामकृष्ण ने अपने अंतिम दिनों में उन्हें सिखाया की मनुष्य की सेवा करना ही भगवान की सबसे बड़ी पूजा है। रामकृष्ण ने नरेंद्र को अपने मठवासियो का ध्यान रखने कहा, और कहा की वे नरेंद्र को एक गुरु की तरह देखना चाहते है। और रामकृष्ण 16 अगस्त 1886 को कोस्सिपोरे में सुबह के समय भगवान को प्राप्त हुए।
मृत्यु – Swami Vivekananda Death
4 जुलाई 1902 (उनकी मृत्यु का दिन) को विवेकानंद सुबह जल्दी उठे, और बेलूर मठ के पूजा घर में पूजा करने गये और बाद में 3 घंटो तक योग भी किया। उन्होंने छात्रो को शुक्ल-यजुर-वेद, संस्कृत और योग साधना के विषय में पढाया, बाद में अपने सहशिष्यों के साथ चर्चा की और रामकृष्ण मठ में वैदिक महाविद्यालय बनाने पर विचार विमर्श किये।
7 P.M. को विवेकानंद अपने रूम में गये, और अपने शिष्य को शांति भंग करने के लिए मना किया, और 9 P.M को योगा करते समय उनकी मृत्यु हो गयी। उनके शिष्यों के अनुसार, उनकी मृत्यु का कारण उनके दिमाग में रक्तवाहिनी में दरार आने के कारन उन्हें महासमाधि प्राप्त होना है।
उनके शिष्यों के अनुसार उनकी महासमाधि का कारण ब्रह्मरंधरा (योगा का एक प्रकार) था। उन्होंने अपनी भविष्यवाणी को सही साबित किया की वे 40 साल से ज्यादा नहीं जियेंगे। बेलूर की गंगा नदी में उनके शव को चन्दन की लकडियो से अग्नि दी गयी।

एक नजर में स्वामी विवेकानंद की जानकारी  – Swami Vivekananda Information

1) कॉलेज में शिक्षा लेते समय वो ब्राम्हो समाज की तरफ आसक्त हुये थे। ब्राम्हो समाज के प्रभाव से वो मूर्तिपूजा और नास्तिकवाद इसके विरोध में थे। पर आगे 1882 में उनकी रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात हुई। ये घटना विवेकानंद के जीवन को पलटकर रखने वाली साबित हुयी।
योग साधना के मार्ग से मोक्ष प्राप्ति की जा सकती है, ऐसा विश्वास रामकृष्ण परमहंस इनका था। उनके इस विचार ने विवेकानंद पर बहोत बड़ा प्रभाव डाला। और वो रामकृष्ण के शिष्य बन गये।
2) 1886 में रामकुष्ण परमहंस का देहवसान हुवा।
3) 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में धर्म की विश्व परिषद थी। इस परिषद् को उपस्थित रहकर स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म की साईड बहोत प्रभाव से रखी। अपने भाषण की शुरुवात ‘प्रिय-भाई-बहन’ ऐसा करके उन्होंने अपनी बड़ी शैली में हिंदू धर्म की श्रेष्ठता और महानता दिखाई।
4) स्वामी विवेकानंद के प्रभावी व्यक्तिमत्व के कारण और उनकी विव्दत्ता के कारण अमेरिका के बहोत लोग उनको चाहने लगे। उनके चाहने वालो ने अमेरिका में जगह जगह ऊनके व्याख्यान किये।
विवेकानंद 2 साल अमेरिका में रहे। उन दो सालो में उन्होंने हिंदू धर्म का विश्वबंधुत्व का महान संदेश वहा के लोगों तक पहुचाया। उसके बाद स्वामी विवेकानंद इग्लंड गये। वहा की मार्गारेट नोबेल उनकी शिष्या बनी। आगे वो बहन निवेदीता के नाम से प्रसिध्द हुई।
5) 1897 में उन्होंने ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की। उसके साथ ही दुनिया में जगह जगह रामकृष्ण मिशन की शाखाये स्थापना की। दुनिया के सभी धर्म सत्य है और वो एकही ध्येय की तरफ जाने के अलग अलग रास्ते है। ऐसा रामकृष्ण मिशन की शिक्षा थी।
6) रामकृष्ण मिशन ने धर्म के साथ-साथ सामाजिक सुधार लानेपर विशेष प्रयत्न किये। इसके अलावा मिशन की तरफ से जगह-जगह अनाथाश्रम, अस्पताल, छात्रावास की स्थापना की गई।
7) अंधश्रध्दा, कर्मकांड और आत्यंतिक ग्रंथ प्रामान्य छोड़ो और विवेक बुद्धिसे धर्म का अभ्यास करो। इन्सान की सेवा यही सच्चा धर्म है। ऐसी शिक्षा उन्होंने भारतीयों को दी। उन्होंने जाती व्यवस्था पर हल्ला चढाया। उन्होंने मानवतावाद और विश्वबंधुत्व इस तत्व का पुरस्कार किया। हिंदू धर्म और संस्कृति इनका महत्व विवेकानंद ने इस दुनिया को समझाया।
विशेषता: स्वामी विवेकानंद का 12 जनवरी ये जन्मदिन ‘युवादीन’ रूप में मनाया जाता हैं।
मृत्यु: 4 जुलाई 1902  को स्वामी विवेकानंद दुनिया छोड़कर चले गये।
श्री रामकृष्ण परमहंस से प्रभावित होकर वे आस्तिकता की ओर उन्मुख हुए थे और उन्होंने सारे भारत में घूम-घूम कर ज्ञान की ज्योत जलानी शुरु कर दी।
“उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये !!”
स्वामी विवेकानंद द्वारा कहे इस वाक्य ने उन्हें विश्व विख्यात बना दिया था। और यही वाक्य आज कई लोगो के जीवन का आधार भी बन चूका है। इसमें कोई शक नहीं की स्वामीजी आज भी अधिकांश युवाओ के आदर्श व्यक्ति है।
उनकी हमेशा से ये सोच रही है की आज का युवक को शारीरिक प्रगति से ज्यादा आंतरिक प्रगति करने की जरुरत है। आज के युवाओ को अलग-अलग दिशा में भटकने की बजाये एक ही दिशा में ध्यान केन्द्रित करना चाहिये। और अंत तक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिये। युवाओ को अपने प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करना चाहिये।
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सबसे बड़ी ई कॉमर्स साईट “अलीबाबा” ग्रुप के फाउंडर जैक मा | Jack Ma Alibaba Story

सबसे बड़ी ई कॉमर्स साईट “अलीबाबा” ग्रुप के फाउंडर जैक मा | Jack Ma Alibaba Story-

Jack Ma Alibaba Story
हम सभी ये जानते है की सफलता – असफलता हमारे जीवन का एक हिस्सा है, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है की हम उन असफलताओं से निराश होते है या उनसे कुछ सीखते हुए आगे बढ़ते है। लेकिन क्या आप विश्वास कर सकते है की जो इंसान एक साधारण सी नौकरी पाने के लिए भी लगभग कई बार रिजेक्ट हुआ हो वो आज अपने देश का सबसे अमीर व्यक्ति बन सकता है जी हां दोस्तों ये बिलकुल सच है सच्ची मेहनत और लगन के साथ सब कुछ किया जा सकता है।
ये कर दिखाया है जैक मा ने ये वही जैक मा है जिन्होंने चीन की सबसे बड़ी ई कॉमर्स साईट “अलीबाबा” का निर्माण किया है। जैक अलीबाबा ग्रुप के फाउंडर है,आइये जानते है जैक की कहानी को करीब से…….

सबसे बड़ी ई कॉमर्स साईट “अलीबाबा” ग्रुप के फाउंडर जैक मा – Jack Ma Alibaba Story

जैक का जन्म 10 सितम्बर 1964 को चीन के जेजिआंग प्रान्त के एक बहुत ही छोटे गाँव ह्न्हाजु में हुआ था। जैक के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत ही ख़राब थी। जैक एक बहुत ही साधारण से परिवार से थे, उनके माता पिता पारंपरिक नाटकों और प्रसिद्द कहानियों को सुनाने का कम करते थे, यही एक मात्र साधन था उनके परिवार की आजीविका का।
जैक ने जेंगयिंग नाम की लड़की से शादी की। उनका एक बेटा और एक बेटी है। जैक और उनकी पत्नी एक ही यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे। उन्होंने स्नातक की शिक्षा साथ ही प्राप्त की, जिसके बाद उन्होंने 1980 में शादी कर ली।
जैक को बचपन से ही इंग्लिश बोलने और सिखने का बहुत शौक था। 60 के दशक में चीन में इंग्लिश भाषा का बिलकुल महत्त्व नहीं था। लेकिन जैक कैसे भी कर के इंग्लिश बोलना और सीखना चाहते थे, इसलिए 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने चीन में विदेशों से आने वाले पर्यटकों की मदद लेना शुरू कर दी, वे पर्यटकों से अपनी टूटी – फूटी इंग्लिश में बात करने की कोशिश करते इसके लिए वे उन्हें चीन के पर्यटन स्थलों की जानकारी देते। उन्होंने 9 सालों तक ये काम किया।इस तरह जैक एक टूरिस्ट गाइड बन गये। धीरे – धीरे उनकी इंग्लिश में सुधर होने लगा।

जैक मा का करियर – Jack Ma Career

जैक के करियर कि शुरुआत काफी चुनौती पूर्ण रही,जैक ने अपने करियर की शुरुआत में पुलिस की नौकरी के लिए भी आवेदन किया। लेकिन उन्हें यहाँ से निराश होना पढ़ा। बतौर जैक नौकरी के लिए उन्होंने लगभग 30 अलग अलग जगह से निराश होना पढ़ा।
1995 की शुरआत में वे अपने दोस्तों की मदद से अमेरिका गये जहा उन्होंने पहली बार इन्टरनेट देखा। जैक मा ने इससे पहले कभी इन्टरनेट नही चलाया था, उन्होंने जब पहली बार इन्टरनेट चलाया तो उन्होंने “Beer” शब्द खोजा। उन्हें Beer से संबधित कई जानकारी अलग अलग देशो से प्राप्त हुयी लेकिन वो ये देखकर चौक गये कि उस सर्च में चीन का नाम कही नही था। अगले बार उन्होंने चीन के बारे में सामान्य जानकारी ढूंढने की कोशिश की लेकिन फिर वो चौक गये कि चीन को कोई जानकारी इन्टनेट पर उपलब्ध नही थी।
अपने देश की जानकारी इंटरनेट पर ना होने से जैक बहुत दुखी हुए क्योंकि इससे उन्हें लगा कि चीन तकनीकी क्षेत्र में अन्य देशो से काफी पीछे है और वो आगे बढना ही नही चाहता है। इसी वजह से उन्होंने अपने मित्र के साथ मिलकर चीन की जानकारी देने वाली पहली वेबसाइट “ugly” बनाई।
तब जैक मा को एहसास हुआ कि इन्टरनेट से बहुत कुछ किया जा सकता है। 1995 में जैक, और दोस्तों ने मिलकर 20,000 डॉलर इकट्ठे किये और एक कम्पनी की शुरुवात की। इस कम्पनी का मुख्य काम दुसरी कंपनियों के लिए वेबसाइट बनाना था। उन्होंने अपनी कम्पनी का नाम “China Yellow Pages” रखा था।
तीन साल के अंदर उनकी कम्पनी ने 8 लाख डॉलर कमाए। अब जैक ने अपने अमेरिका के एक मित्र की मदद से चीनी कंपनियों ले लिए भी वेबसाइट बनाना शूरू कर दिया। जैक ने पहली बार 33 वर्ष की उम्र में अपना पहला कंप्यूटर खरीदा था।
1998 से 1999 में जैक मा ने China International Electronic Commerce Center द्वारा स्थापित एक IT कम्पनी की अध्यक्षता का कार्य किया। 1999 में उन्होंने वहा से काम छोड़ दिया और हंजाऊ अपनी टीम के साथ लौट आये, जहाँ उन्होंने अपने 17 दोस्तों के साथ मिलकर एक अपने घर से चीन की पहली B2B वेबसाइट अलीबाबा की स्थापना की।
उन्होंने अलीबाबा के द्वारा एक इतिहास रच दिया जो उन्होंने 5 लाख युवान से शूरु की और जिसके 79 मिलियन सदस्य 240 से ज्यादा देशो में फैले हुए है। अक्टूबर 1999 और जनवरी 2000 में अलीबाबा ने दो बार 25 मिलियन डॉलर का international venture capital investment जीता था। अपने इस प्रोग्राम से वो अपने देश के e-commerce मार्किट में सुधार लाना चाहते थे जो छोटे और मध्यमवर्गीय व्यवसायों को विश्व स्तर पर लेकर जाए।
Global e-commerce system को सुधारन के लिए 2003 में जैक मा ने Taobao Marketplace की स्थापना की, जिसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए eBay ने इसे खरीदने का ऑफर दिया। जैक मा ने eBay का प्रस्ताव ठुकरा दिया और इसकी बजाय उसने याहू के को-फाउंडर जेरी से 1 बिलियन डॉलर की सहायता ली।
सितम्बर 2014 के आंकड़ो के अनुसार अलीबाबा ने New York Stock Exchange में 25 बिलियन डॉलर की कम्पनी खडी कर दी। अलीबाबा इस राशि के साथ विश्व की सबसे प्रख्यात टेक कम्पनियों में गिनी जाने लगी। जैक मा वर्तमान में अलीबाबा ग्रुप के कार्यकारी अध्यक्ष है जिनकी दससहायक कंपनिया Alibaba।com, Taobao Marketplace, Tmall, eTao, Alibaba Cloud Computing, Juhuasuan, 1688।com, AliExpress।com and Alipay कार्यरत है । नवम्बर 2012 में अलीबाबा का ऑनलाइन लेनदेन 1 ट्रिलियन युआन से भी आगे बढ़ गया ।

जैक को मिले सम्मान एवं पुरस्कार – Jack Ma Awards

  • 2004 – चाइना सेन्ट्रल टेलीविसन द्वारा Top 10 Business Leaders of the Year चुना गया।
  • 2005 – वर्ल्ड इकनोमिक फोरम द्वारा यंग ग्लोबल लीडर चुना गया और फार्च्यून पत्रिका ने जैक को 25 मोस्ट पॉवरफुल बिजनेस पीपल इन एशिया में स्थान दिया गया।
  • 2007 – बिज़नस वीक में बिजनेस परसों ऑफ़ द ईयर का अवार्ड दिया गया।
  • 2008 – 30 World’s Best CEOs की सूची मे शामिल किया गया।
  • 2010 – फ़ोर्ब्स एशिया द्वारा प्राकुतिक आपदा प्रबंधन और गरीबी उन्मूलन जैसे कार्यो के लिए Asia’s Heroes of Philanthropy में से एक चुना गया।
  • 2013 – हांग कांग यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि दी गयी।
  • 2015 – The Asian Awards में Entrepreneur of the Year से नवाजा गया।
जैक मा के बारे में कुछ रोचक तथ्य – Interesting Facts about Jack Ma
  • उद्योग की दुनिया की मशहूर मैगजीन “फार्च्यून” ने जैक को दुनिया के 50 महान लीडर्स की सूचि में दुसरे स्थान का दर्जा दिया है।
  • एक रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त 2017 में जैक की संपत्ति करीब 36।4 बिलियन अमेरिकी डॉलर आंकी गई।
  • जैक मा चीन के अमीर व्यक्तियों की सूचि में शीर्ष पर है, अर्थात पहले स्थान पर है, और वे दुनिया के अमीर व्यक्तियों की सूचि में 18 वे नंबर पर है।
  • स्कूल के दौरान जैक को विद्यार्थी परिषद् का अघ्यक्ष चुना गया।
  • जैक समय समय पर युवा पीढ़ी को बिजनेस सम्बन्धी बाते भी शेयर करते रहते है।
  • जैक को 2014 में फ़ोर्ब्स द्वारा विश्व के पशक्तिशाली व्यक्तियों की सूची में 30वा स्थान दिया गया।
  • जैक को अपना नाम उनके एक विदेशी पर्यटक मित्र द्वारा दिया गया था।
  • जैक को 2009 में टाइम मैगज़ीन द्विश्व के “100 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों” की सूची में शामिल किया।
  • इसी साल उन्हें फ़ोर्ब्स चीन की तरफ से Top 10 Most Respected Entrepreneurs in China चुना गया।
दुनिया में जो लोग खुद के दम पर कुछ करना चाहते है उन्हें निश्चित ही यह कहानी प्रेरित करेगी। विश्वभर के उद्योगपतियों एवं व्यवसायियों के लिए जैक एक बहुत ही प्रभावशाली व्यक्ति है, साथ ही जैक की कहानी हम सभी के लिए भी एक प्रेरणा है।
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